बच्चों में शौच में खून आने का कारण हो सकता पॉलिप्स

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अक्सर आपने देखा या सुना होगा कि 2 साल से अधिक उम्र के छोटे बच्चों में गुदा द्वार से मल (लैट्रीन) में खून आता है जो कि 2-3 बूंद से लेकर अधिक भी हो सकता है। इन बच्चों में कुछ महीनों से हर 5-7 दिन या कभी-कभी 15 – 20 दिन में थोड़ा-थोड़ा खून आने की समस्या बनी रहती है। यह खून अक्सर लाल रंग का ताजा खून होता है तथा इसकी वजह से बच्चों में खून की कमी हो जाती है तथा कभी-कभी तो खून चढ़ाने की नौबत तक आ जाती है। इन बच्चों को पेट में कोई दर्द नहीं होता है। मल करते समय भी कोई दर्द नहीं होता है।

क्या होती है यह समस्या:
मलाशय या बड़ी आंत के निचले हिस्से में कई बार अंदर की म्यूकोसा वृद्धि करके एक गोल सी संरचना के रूप में बाहर निकल आती है जिसे पॉलिप कहते है। सामान्यतः यह पॉलिप या तो डण्ठल के जरिए म्यूकोसा की सतह (आंत की दीवार)में जुड़े होते हैं या बिना डण्ठल के सीधे ही जुड़े होते हैं। संख्या में पॉलिप 1-2 या कभी-कभी बहुत सारे भी हो सकते हैं। कुछ पॉलिप्स कैंसर में बदल सकते हैं या पहले से कैंसेरस होते हैं। सुरक्षित रहने के लिए चिकित्सक पॉलिप्स को निकालकर उनका परीक्षण करते हैं।

पॉलिप होने के प्रमुख कारणः
पॉलिप की समस्या कुछ बच्चों में अनुवांशिक तौर पर हो सकती है। अधिक दूध पीने, फल सब्जियां न खाने या कम खाने से कब्ज की शिकायत होने से भी बच्चों में पॉलिप बन सकते हैं।

समय पर उपचार न होने के दुष्प्रभावः
इस रोग में बच्चे के शरीर से खून निकलने का उसे पता नहीं चलता क्योंकि अमूमन दर्द नहीं होता है। अगर माता-पिता बच्चे के स्टूल पर ध्यान न दें, तो उन्हें भी पता नहीं चल पाता। या कुछ लोग खून की कम मात्रा देखकर, इस कब्ज़ का नतीजा मानकर, थोड़ी बहुत दवाई देकर इलाज करने की कोशिश करते हैं। जबकि पॉलिप को निकालना ही इसका स्थायी समाधान है। समय पर इलाज न होने से बच्चे के शरीर में खून की कमी होती है, तो उसे ब्लड भी चढ़ाना पड़ सकता है। |

इसके अलावा बच्चे के आईक्यू लेवल कम होने, विटामिन डी और अन्य जरूरी तत्वों की शरीर में कमी, भूख न लगने की वजह से शारीरिक और मानसिक विकास की गति रुकने जैसे बड़े संकट भी उत्पन्न हो सकते हैं।

क्या हैं उपचार:
पहले ऑपरेशन या अगर पॉलिप गुदा द्वार से थोड़ा ही अंदर हो, तो निकाला जा सकता था। पर अब दूरबीन की विधि से बिना चीर-फाड़ के किसी भी तरह के पॉलिप को निकाला जा सकता है, चाहे वह गुदा द्वार से कितना भी अंदर क्यों न हो। इस विधि को स्नेयर पोलीपेक्टोमी कहते है। इसमें एक वायर कोलोनास्कोप या दूरबीन से शरीर के भीतर जाता है तथा इस वायर में पॉलिप डण्ठल को फंसाकर या फिर इलेक्ट्रिक करंट से काटा जाता है। इस तरह बिना चीर-फाड़ के बच्चों में लगातार आने वाले खून की समस्या से निजात पाया जा सकता है।

बचाव के लिए एक साल की उम्र से आहार में ये ध्यान रखें
छोटी उम्र से ही बच्चे को फल एवं सब्जियां देना शुरू कर देना चाहिए ताकि उसे कब्ज की शिकायत न हो। इसलिए एक साल की उम्र से ही बच्चे के आहार में फल और सब्जियों का आहार बढ़ाकर, दूध की मात्रा संतुलित रखी जाए तो बच्चे को पॉलिप से बचा सकते हैं।