बचपन के अत्याचार और माता-पिता के झगड़ों से हो सकता हैं बच्चे का दिल बीमार

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बचपन में किसी का स्नेह और सहयोग वाला वातावरण नहीं मिलता है तो उसके जेहन में लगातार तनाव की स्थिति बनी रहती है। जिससे हार्मोनल संतुलन भी बिगड़ जाता है। यह स्थिति शरीर में मानसिक एवं शारीरिक स्तर पर कई तरह के बदलाव करती है और बड़े होने पर कई शारीरिक बीमारियों का कारण बन सकती हैं। तनाव से हार्मोन असंतुलित होने से ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है, जो भविष्य में दिल की बीमारी के लिए भी जिम्मेदार हो सकता है। अगर घर में तनाव होगा तो निश्चित ही उसका असर स्वास्थ्य संबंधी देखभाल पर भी होगा। सही आहार न मिलने, अनियमित जीवनशैली व गलत दवाइयों के सेवन से हुआ ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर बढ़ने, हृदय रोग, मोटापे जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का मूल बन सकता है। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अध्ययन के मुताबिक किशोरावस्था में जो बच्चे बुलिंग, अनदेखी, हिंसा अपनी आंखों के सामने देखते हैं, उनमें बड़े होने पर रक्तशिराओं से जुड़ी बीमारियां, तनाव की वजह से अधिक खाना, टाइप-टू डायबिटीज होने का ख़तरा उन लोगों की तुलना में अधिक होता है, जो इस तरह की स्थिति का सामना नहीं करते हैं।

इन समस्याओं के कारण वयस्क होने पर इन बीमारियों के होने की आशंका दोगुनी हो जाती है।

  • मोटापा
  • कोरोनरी हार्ट डिसीज हार्ट अटैक स्ट्रोक
  • हाई ब्लडप्रेशर
  • टाइप-2 डायबिटीज

ये कारण बढ़ाते हैं बच्चों में अवसाद और तनाव अन्य बच्चों से तुलना या गलत प्रतिस्पर्धा अपने बच्चे की पढ़ाई, व्यवहार को लेकर अन्य बच्चों से पेरेंट्स तुलना करते हैं, जो बच्चों में अवसाद और तनाव को बढ़ाता है।

माता-पिता का आपस में झगड़ना
बच्चों के सामने पेरेंट्स का पैसे, किसी दूसरे व्यक्ति की बात को लेकर आपस में झगड़ना भी बच्चे के दिमाग पर बुरा असर डालता है।

बुलिंग का शिकार होना
अपने से बड़े या साथ के बच्चों के द्वारा परेशान किए जाने, डराने धमकाने, चिढ़ाने से बच्चे में तनाव बढ़ता है। कई बार वह घर में भी जब अपनी बात न कहकर चुपचाप रहते हैं, तो उसका असर भी उनके शरीर पर तनाव के रूप में होता है।

माता-पिता से पर्याप्त समय न मिलना
बच्चों की बातों को नजरअंदाज करने से बच्चे तनावग्रस्त होते हैं।

सोशल मीडिया बुलिंग
पेरेंट्स के पास समय न हो तो वह आजकल बच्चे को स्मार्टफोन, टेबलेट जैसे डिजिटल डिवाइस दे देते हैं। ज्यादा समय तक इन डिवाइस के उपयोग से भी बच्चे के मानसिक एवं शारीरिक विकास पर असर होता है। वह अवसादग्रस्त हो सकता है। सोशल मीडिया पर बुलिंग का शिकार भी हो सकता है।

बच्चों में अवसाद और तनाव के लक्षण:

  • गुस्सा या चिड़चिड़ापन
  • भूख बढ़ना या कम होना
  • ध्यान लगने में मुश्किल होना
  • पढ़ने में दिक्क्त होना
  • नींद बढ़ना या कम आना
  • बार-बार रोना या चिल्लाना
  • लोगों से दूरी बनाना
  • अधिकांश समय अकेले रहना।

अवसाद व तनाव से इम्यूनिटी और मेटाबॉलिज्म प्रभावित बच्चे अधिक खाने लगते हैं जो कि आगे चलकर उनकी आर्टरीज में रुकावट का कारण बन सकता है। डिप्रेशन, एंगज़ाइटी और तनाव के लक्षणों को पहचानकर उन्हें दूर करने उपाय करना बेहद जरूरी होता है क्योंकि लम्बे समय तक यह परिस्थिति रहने से बच्चे के स्वास्थ्य पर जीवनशैली से संबंधित बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है। विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि लम्बे समय तक चलने वाला तनाव शरीर की सामान्य प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता, मेटाबॉलिज्म, नर्वस और एंडोक्राइन सिस्टम पर असर पड़ता है।

क्रॉनिक स्ट्रेस का हृदय पर असर
अध्ययन बताते हैं कि लम्बे समय तक चलने वाले तनाव की स्थिति में व्यक्ति की सेंट्रल आर्टरीज़ में सख्ती आ जाती है और दिल की बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है। क्रॉनिक स्ट्रेस की वजह से होने वाले डिप्रेशन और एंगज़ाइटी की स्थिति में लोग अस्वस्थ्य जीवनशैली जीने लगते हैं जो कि दिल की समस्याओं का एक बड़ा कारण है। लगातार तनाव से बच्चे के जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

बच्चे से खुलकर बात कीजिए
बच्चे ऐसा माहौल दें कि वह पेरेंट्स से खुलकर अपनी बात कह सके। बच्चे परिचितों के हाथों भी सताए जाते हैं। यह बड़े नाजुक मामले होते हैं। ऐसे में असमंजस में रहने की बजाय, बच्चे से पूरी बात समझें। उसे बच्चा कहकर, बात को ख़ारिज करने का प्रयास बिलकुल भी न करें। उत्पीड़न अगर ख़ामोशी के नीचे दब जाए, तो वयस्क होने पर रोग की जड़ बन सकता है।

सही पेरेंटिंग और सही आहार:
सकारात्मक माहौल बच्चों में बीमारियों का खतरा कम करेगा। बच्चों को अच्छी परवरिश, पोषक आहार, सही जीवनशैली और सुरक्षित माहौल मिलना जरूरी है। इसीलिए कहा जाता है कि पूरे परिवार को मिल-जुलकर, हंसते हुए पौष्टिक भोजन करना चाहिए। यह स्वस्थ जीवन का आधार है।

अटपटे व्यवहार को समझे
अक्सर बच्चे अपनी परेशानियों को समझ नहीं पाते और गुस्सा दिखाकर या रोकर असहाय स्थिति प्रकट करते हैं। इसी तरह अचानक चुप हो जाने के पीछे भी कोई तनावजन्य कारण होगा। अभिभावक अगर पूरा विश्वास व्यक्त करते हुए बात करें, तो तनाव की जड़ तक पहुंचा जा सकता है। अगर बुलिंग जैसी कोई समस्या हल न हो, तो । पैरेंट्स को अपने बच्चों को रेमेडियल साइकोथेरेपी के सेशन अटेंड करने के लिए प्रेरित करना चाहिए क्योंकि मानसिक आघात बच्चे की जेहन में बहुत गहराई तक बैठा होता है जिसे बाहर न निकाले जाने की स्थिति में उसे तमाम तरह की स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

तनावजनित दिल के रोग की सम्भाल:

  • नियमित व्यायाम करें।
  • दवाएं नियमित लें और दिनचर्या व्यवस्थित रखें।
  • प्रोग्रेसिव रिलेक्सेशन टेकनीक का प्रयोग करें।
  • आहार और निद्रा का समय निश्चित करना चाहिए।
  • काउंसिलिंग और साइकोथेरेपी लें।
  • नियमित चेकअप कराते रहना चाहिए
  • ज्यादा वसा वाला भोजन नही लेना चाहिए।