नेपाल अपनी समस्याएं खुद सुलझाए

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नेपाल में नया संविधान बनने के बाद पहली बार आम चुनाव हुए. 7 दिसंबर को यहां संसदीय और प्रांतीय चुनाव में दूसरे चरण का मतदान हुआ.

45 जिलों में संसद के लिए 128 सीटों और राज्यों में विधान परिषदों के लिए 256 सीटों पर मतदान कराए गए.

इस बार के चुनावों में सबसे बड़ी बात ये है कि देश की प्रमुख वामपंथी और कम्युनिस्ट पार्टियां नेकपा माओवादी केंद्र और नेकपा एमाले संयुक्त रूप से चुनाव मैदान में उतरीं.

इस वजह से अब इस बात की गारंटी हो गई है कि जो नई संसद बनेगी, उसमें एक पार्टी ऐसी होगी जिसके पास स्पष्ट बहुमत होगा. बहुत उम्मीद है कि इनके पास दो तिहाई बहुमत हो. अगर ऐसा हो जाता है तो संविधान में अभी बहुत सारे संशोधन होने हैं, उसके लिए एक रास्ता तैयार हो जाएगा.

एकता बनी रहे तो बात बने

एक नज़रिए से देखा जाए तो ये बेहद महत्वपूर्ण चुनाव हैं. नेपाल में ऐसी ताकतें हैं जो नहीं चाहतीं कि नेपाल में आमूल-चूल परिवर्तन हों. ऐसी ताकतों के लिए दिक्कतें पैदा हो सकती हैं.

अभी जो नतीजे आने की उम्मीद है, उससे लगता है कि अगर कोई सरकार पांच साल पूरे कर लेती है तो कहा जा सकता है कि जो शांति प्रक्रिया यहां से शुरू हुई है, वो एक मुकाम तक पहुंच सकेगी.

लेकिन इसके साथ-साथ ये डर भी है कि कहीं नेतृत्व को लेकर आपस में खींचतान ना हो.

दूसरे चरण के चुनावों में तराई के इलाके शामिल हैं, जो बीते कई सालों से मधेशी आंदोलन के लिए जाने जाते हैं. इन इलाकों में मधेशी लोग सरकार से नाराज़ हैं. उनका आरोप है कि सत्ता पर नियंत्रण पहाड़ी लोगों का है और काठमांडू से चलने वाली सरकार में उनकी सहभागिता नहीं है.

Source Bbc

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