पुरुषों से 4 गुना ज्यादा होती है महिलाओं में यह समस्या

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आरामतलब जीवनशैली, फैशन भूलों, कामकाज और रोजगार के तौरजा तरीकों के कारण जिन बीमारियों में वृद्धि हुई है उनमें वैरिकोस वेन्स (Varicose veins)
भी शामिल हैं। वैरिकोस वेन्स आधुनिक समय में अत्यंत सामान्य समस्या बन गई है। एक अनुमान के अनुसार दस से बीस प्रतिशत लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं। पचास वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में यह बीमारी बहुत अधिक दिखती है। महिलाओं में यह बीमारी पुरुषों की तुलना में चार गुना ज़्यादा है। खास तौर पर ऊंची एड़ी के फुटवेयर तथा टाइट पोशाकें पहनने वाली महिलाओं के इस बीमारी से ग्रस्त होने की आशंका बहुत अधिक होती है।

वैरिकोस वेन्स हैं क्या?
आर्टरीज दिल से शुद्ध रक्त को शरीर के विभिन्न हिस्सों में ले जाती हैं और वेन्स अशुद्ध रक्त को दिल तक लौटाती हैं। पैरों की शिराओं को गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध, रक्त को विपरीत दिशा में भेजने का दुष्कर काम करना होता है। शिराओं के जरिए जब अशुद्ध रक्त हृदय की ओर जाता है तब उनमें मौजूद वॉल्व खुल जाते हैं। लेकिन खड़े होने के प्रभाव से जब रक्त नीचे की ओर आता है तो वॉल्व बंद हो जाते हैं। वॉल्व की ख़राबी के कारण शिराओं में अशुद्ध रक्त वापस लौट आता है और वे फूल जाती हैं। इसी को वैरिकोसिटी करते हैं। रक्त के दबाव के कारण वेंस आड़ी-टेढ़ी भी हो जाती हैं। इनमें अशुद्ध रक्त होता है, इसलिए ये नीली दिखती हैं।

वैरिकोस वेन्स के लक्षण
वैरिकोस वेन्स (Varicose veins) होने पर पैरों में स्थायी रूप से सूजन एवं भारीपन की शिकायत रहती है। पैरों की त्वचा काले-नीले रंग की हो जाती है। पैरों एंव जांधों में केंचुए की आकार की नीली गुच्छेदार नसें उभर जाती हैं जिससे पैर सामान्य नहीं दिखाई देते। खड़े होने एवं चलने-फिरने पर पैरों में दर्द होता है। इलाज में देर होने या इलाज नहीं होने पर पैरों में एक्जिमा तथा कभी नहीं भरने वाले जख्म यानी वैरिकोस अल्सर हो जाते हैं। बाद में इनमें इन्फेक्शन, एक्जिमा व भारी रक्त स्राव होने पर मरीज चलने -फिरने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है।

वैरिकोस वेन्स के कारण
जीवनशैली का असर : वैरिकोस वेन्स होने के लिए वैसे तो आनुवांशिक कारण मुख्य रूप से जिम्मेदार है लेकिन मोटापा, व्यायाम नहीं करने की आदत, महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान रक्त शिराओं पर अधिक दबाव पड़ने, रहन-सहन के गलत तौर-तरीकों तथा अधिक समय तक खड़े रहने और पैर लटकाकर बैठने आदि के कारण भी वैरिकोस वेन्स की आशंका होती है।
आनुवंशिक कारण: करीब चालीस प्रतिशत मरीजों में वैरिकोस वेन्स की बीमारीं वंशानुगत होती है। इसके अलावा मोटापा, उम्र ढलने तथा व्यायाम नहीं करने के कारण रक्त शिराएं कमजोर हो जाती हैं और वैरिकोस वेन्स की समस्या उत्पन्न होती है। मोटापे के कारण पैरों में चर्बी ज़्यादा हो जाने की वजह से रक्त शिराओं को पर्याप्त सहारा नहीं मिल पाता और वे कमजोर पड़ जाती हैं।

लगातार एक स्थिति में कार्य करना
बहुत सी नौकरियों में लंबे समय तक खड़े रहना पड़ता है या पैर लटका कर बैठे रहना पड़ता है। यही कारण है कि ट्रैफिक पुलिसवालों, सर्जनों, कंप्यूटर पर काम करने वालों तथा दफ्तरों में देर तक पैर लटकाकर बैठने वालों को यह बीमारी होने | की अधिक आशंका होती है। पांच सितारा होटलों के स्वागतकक्ष व रसोइधरों व कॉल सेंटरों में काम करने वाले नवयुवकों में हमेशा वैरिकोस वेन्स उत्पन्न होने का ख़तरा रहता है। पैर की हड्डी के फ्रेक्चर एवं पैर की नसों में सूजन तथा रुकावट होने पर भी वैरिकोस वेन्स का ख़तरा रहता है।

महिलाओं में अधिक क्यों?
महिलाओं में कुछ हार्मोन की वजह से रक्त शिराओं की दीवारें फैल जाती हैं। गर्भावस्था के दौरान पैरों की रक्त शिराओं पर अधिक दबाव पड़ने के कारण वे कमजोर हो जाती हैं। हालांकि ज़्यादातर महिलाओं में गर्भावस्था के बाद यह समस्या अपने आप ठीक हो जाती हैं। बच्चेदानी के ट्यूमर के कारण भी यह बीमारी हो सकती है। वहीं ऊंची एड़ी की सैंडिल एंव जूतियां तथा अत्यंत टाइट पैंट एंव जींस पहनने के कारण यह समस्या होने की आशंका बहुत अधिक रहती है। टाइट पोशाक पहनने के कारण कमर एवं जांधों पर अधिक दबाव पड़ता है जिससे शिराओं में रक्त का बहाव रुक जाता है।

जानकारी न होने से समय पर नहीं हो पाता उपचार :
इस बीमारी के बारे में जानकारी न होने के कारण ज़्यादातर लोग इसे आर्थराइटिस, सायटिका और रक्त धमनियों में रुकावट जैसी समस्या मान लेते हैं जिससे सही उपचार में विलंब होता है और बीमारी बढ़ती जाती है। इस बीमारी का उपचार कार्डियोवैस्कुलर या वैस्कुलर सर्जन द्वारा किया जाता है।

वैरिकोस वेन्स के उपचार
इसका इलाज व्यायाम, जीवन शैली में बदलाव एवं दवाइयों के सहारे किया जाता है। क्रमित दबाव वाली जुराबें इस रोग के नियन्त्रण में काफी कारगर सिद्ध होती हैं। इन क्रमित दबाव वाली जुराबों की मरीज़ के हिसाब से सही फिटिंग व नाप अत्यन्त आवश्यक है। कभी-कभी इंजेक्शन (स्क्लेरोथैरेपी) के जरिए भी इलाज किया जाता है। पर यह अधिक कारगर व स्थायी नहीं होता है।
इस रोग के बढ़ने पर ऑपरेशन की मदद से वैरिकोस वेन्स को निकाल दिया जाता है। इसके लिए फ्लेबेक्टोमी, वेन स्ट्रेपिंग और एंडोस्कोपी जैसी विधियों का इस्तेमाल किया जाता है। |
जब बीमारी अधिक गंभीर हो जाए और पैर में ठीक नहीं होने वाले जख्म बन जाएं तो लेजर की मदद से सर्जरी करने की जरुरत पड़ सकती है।