गुजरात क्यों भेजे जा रहे हैं महुए के हज़ारों लड्डू?

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दूसरी जगहों की बात छोड़िए, झारखंड में भी लोग महुआ लड्डू का नाम सुनकर चौंक जाते हैं.

नज़र पड़ी और सवाल शुरू. कैसे बनाया इसे? वही महुआ जिससे शराब बनाई जाती है? क्या कोई रसायन (केमिकल) या रंग इस्तेमाल किया?

तब हम बताते हैं, “रसायन, रंग और नशे का नामोनिशान नहीं. देसी तरीके से हाथों से बनाया है. ख़ुशबूदार और सेहत के लिए भी जानदार. चख कर देखिए.” लड्डू बनाने वाली आरती तिर्की एक सांस में यह सब कह जाती हैं.

मुस्कुराते हुए आगे कहती हैं, “इस पहचान के लिए बहुत संघर्ष करती रही हूँ. बाज़ार मिलना बहुत मुश्किल है, लेकिन हम लोगों ने ठान लिया है कि रुकना नहीं है”.

महुए से शराब बनाई जाती है. झारखंड में लंबे समय से गांव-कस्बों में महिलाएँ इस शराब के ख़िलाफ़ जंग लड़ रही हैं. दूरदराज़ और ख़ास तौर पर आदिवासी इलाकों में महुए की शराब बर्बादी की कहानी लिखती रही है.

मांडर तहसील के चटवल गांव की कुछ आदिवासी महिलाओं ने महुए से होने वाली बर्बादी को क़ामयाबी में बदलने की कोशिश शुरू की है.

इन महिलाओं को पांच जनवरी को बीस हज़ार लड्डू लेकर गुजरात जाना है. ये उनका पहला बड़ा ऑर्डर है जहाँ से उनकी सफलता की कहानी शुरू हो सकती है.

 

Source Bbc

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